श्रीमन्त त्रिकवैभवाचार्य स्वामी रामजी महाराज की पुण्य लयात्मक शिव-सायुज्य तिथि केवल एक महापुरुष के देहावसान का स्मरण नहीं है, अपितु यह उस दिव्य साधना-यात्रा की पूर्णता का उत्सव है, जिसमें सीमित व्यक्तित्व अनन्त चैतन्य में लीन होकर परमशिव के साथ तादात्म्य प्राप्त करता है। त्रिक-दर्शन की परंपरा में ऐसी तिथि को अनुग्रह, प्रकाश और लय का दिवस माना गया है।
स्वामी रामजी महाराज त्रिक शैव परंपरा के उन विरल आचार्यों में से थे, जिनका जीवन स्वयं शास्त्र था और जिनकी साधना स्वयं उपदेश। उनके लिए त्रिक केवल एक दार्शनिक संप्रदाय नहीं था, बल्कि जीवन-पद्धति थीजहाँ शिव और शक्ति, प्रकाश और विमर्श, साधक और साध्य, भिन्न नहीं रह जाते। उन्होंने अपने आचरण द्वारा यह प्रतिपादित किया कि शिव-सायुज्य किसी देह-त्यागोत्तर कल्पना का नाम नहीं, बल्कि जाग्रत अवस्था में प्राप्त होने वाली चैतन्य-स्थिति है।
त्रिक के अनुसार लय का अर्थ विनाश नहीं, प्रत्युत अभेद-बोध में प्रवेश है। स्वामी रामजी महाराज की पुण्य लयात्मक तिथि इसी अर्थ में स्मरणीय हैजहाँ सीमित ‘अहं’ का विसर्जन होकर पूर्ण अहंता का प्रकाश प्रकट होता है। उनका संपूर्ण जीवन अनुत्तर की ओर उन्मुख रहावह अनुत्तर, जो न कारण है, न कार्य, अपितु समस्त कारणों और कार्यों का आधार है।
स्वामी जी की साधना में शिवसूत्र, स्पन्दकारिका और प्रत्यभिज्ञा केवल ग्रंथ नहीं थे, बल्कि अनुभूत सत्य थे। उन्होंने शिष्य-परंपरा को यह बोध कराया कि प्रत्यभिज्ञा का तात्पर्य किसी नवीन वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि स्वस्वरूप की स्मृति है। यही कारण है कि उनका शिक्षण बौद्धिक से अधिक अनुभवात्मक थाजहाँ मौन भी उपदेश बन जाता था।
उनका जीवन वैराग्य और करुणा का अद्वैत समन्वय था। उन्होंने संसार से पलायन नहीं किया, बल्कि संसार को शिवमय देखने की दृष्टि प्रदान की। यही त्रिक की विशिष्टता हैजहाँ भोग भी योग बन सकता है, यदि वह चैतन्य-स्मृति से संयुक्त हो।
आज, उनकी पुण्य लयात्मक शिव-सायुज्य तिथि पर यह शब्द-समर्पण केवल श्रद्धा का औपचारिक निवेदन नहीं, बल्कि उस परंपरा के प्रति कृतज्ञता है, जो हमें यह सिखाती है कि शिव कहीं बाहर नहीं, बल्कि स्वयं हमारी चेतना का स्वरूप हैं। स्वामी रामजी महाराज का जीवन और लय हमें निरंतर स्मरण कराता है कि साधक का अंतिम लक्ष्य कहीं जाना नहीं, बल्कि जो हैउसी को पहचान लेना है।
इसी भाव के साथ, यह विनम्र शब्द-समर्पण उस महायोगी आचार्य के चरणों में अर्पित है, जिनकी लय स्वयं उपदेश बन गई और जिनका मौन आज भी त्रिक-साधकों के हृदय में स्पन्दित हो रहा है।
श्रीमन्त स्वामी रामजी महाराज का जीवन, उनका अनुभव और उनकी साधना त्रिक परंपरा का अनमोल धरोहर हैं। उनकी पुण्य लयात्मक शिव-सायुज्य तिथि पर यह मेरे हृदय का अभिव्यक्त समर्पण है। उनके जीवन में त्रिक दर्शन का अद्भुत समन्वय, शिव और शक्ति का अभेद्य अनुभव और जगत-हित का चरितार्थ मुझे हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।
स्वामी जी ने हमें यह सिखाया कि शिव-सायुज्य केवल ध्यान और मौन का परिणाम नहीं, अपितु जीवन के प्रत्येक क्षण में चेतनता और तादात्म्य का अनुभव है। उनका मार्गदर्शन यह स्पष्ट करता है कि त्रिक-साधना केवल सिद्धांत नहीं, अपितु जीवित अनुभव और जीवन का पूर्णता पथ है।
इस समर्पण के माध्यम से मैं अपने हृदय की श्रद्धा व्यक्त करता हूँ और यह प्रार्थना करता हूँ कि स्वामी रामजी महाराज की दिव्य लय और त्रिकदर्शन की ज्योति हमेशा मेरे लेखन और अध्ययन को आलोकित करती रहे।
समर्पक: डॉ. चमन लाल रैना, लेखक, त्रिकवैभव